Tuesday, May 24, 2011

ट्राम से मेट्रो तक

मनुष्य नें बहुत प्रगति की। बुद्धि के बल पर तरह तरह के नियम क़ानून, रहन सहन के तौर तरीके, और ढेर सारी वस्तुएं। लेकिन यह नहीं सोचा कि जीवन के साथ जितनी भी चीजें मूर्त या अमूर्त रूप में जुड़ेंगी उतना ही जीवन जटिल होता जायेगा। और जितना ही जीवन जटिल होता जायेगा उतनी ही दुश्वारियां जीवन चक्र पूरा करने में आएँगी। प्रकृति का एक नियम है--कुछ भी पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है । निसंदेह हमने बहुत कुछ पाया है, पर यह भी न भूलें कि क्या खोया। यह लेखा जोखा रखना आवश्यक है। कहीं ऐसा न हो कि ट्राम से मेट्रो तक के सफ़र में हम हमेशा पाते रहने के फेर में इतना कुछ गवां बैठे कि उसकी पूर्ति असंभव हो जाय और स्थाई रूप से एक रिक्तता हम अपने जीवन में उत्पन्न कर "पॉइंट ऑफ़ नो रिटर्न" पर पहुँच जायं.

Sunday, May 22, 2011

शमशान में भी सावधान

आज समिति के एक वयोवृद्ध सदस्य के निधन पर भैरोंघाट जान पड़ा. घाट पर कर पार्किंग से कुछ कदम पर लकड़ी के टाल हैं जहाँ से लोग लकड़ी खरीद कर चिता स्थल तक ले जाते हैं. कार से मोबाइल हाथ में ले उतरकर टाल तक जाने में लगभग ३०-४० मीटर की दूरी तय करने के दौरान मोबाईल कुरते की जेब में रख कर लकड़ी तौले जाने का इन्तजार किया और तुल जाने के बाद एक लट्ठा उठाकर चलने को हुआ तो अकस्मात् जेब जिसमे मोबाइल रखा था पर हाथ पड़ा. मोबाइल गायब. इधर उधर देखा कुछ समझ में न आया. वापस कार तक गया भ्रम मिटाने. कुल मिलाकर यह निश्चित हो गया की मोबाइल किसी नें पार कर दिया है. अब चिंतन की बारी थी. घाट पर जलती हुई चिताओं की ओर देखता हुआ सोच रहा था कि शमशान में जाने वालों को तो दुनिया से छणिक विरक्ति शायद हो जाती हो पर शमशान घाट पर ही अपना गुजर बसर करने वालों को बिलकुल भी नहीं. ध्यान से अगर देखें तो लकड़ी बेचने वाले, अंतिम संस्कार कराने वाले पंडे, चिता लगाने वाले, घाट के ऊपर चाय वाले,पान वाले , मिठाई वाले सभी अपने अपने काम में उसी तरह व्यस्त हैं जैसे अन्य कोई जो उस जगह से दूर है. हर प्रकार के प्राणी हर जगह है. चोर,उचक्के, उठाईगीर शमशान पर भी मौजूद हैं. बिजनेस हर जगह चल रहा है. खैर मोबाइल तो जिस दिन खरीदा था उसी दिन से उसे खोने की सम्भावना उत्पन्न कर ली थी. पर समझ में आया कि सावधान रहो हर जगह, शमशान में भी.

Sunday, April 17, 2011

कानपुर विश्वविद्यालय ब्लोग्गर्स असोशिएसन के उदभव पर समस्त बुद्धजीवी वर्ग को शुभकामनाएं. भाई पवन मिश्र जी विशेष रूप से धन्यवाद के पात्र हैं इसलिए कि उन्होंने एक ऐसा मंच तैयार कर दिया है कि आशा करता हूँ हर वो जो विश्वविद्यालयों खासकर कानपुर विश्वविद्यालय के गिरते स्तर के प्रति जागरूक है , चिंतित है , इसके माध्यम से अपनी आवाज़ को उठा सकता है, आगे बढ़ा सकता है. साथिओं, आजकल शिक्षा व्यवस्था एक संक्रमण काल से गुजर रही है. जहाँ एक तरफ सूचना के क्षेत्र में क्रांति है वहीँ सरकारी नीतियों के चलते स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों , विश्वविद्यालयों की बाढ़ से अनेकानेक परिवर्तन हो रहें हैं एवं निकट भविष्य में संभव है. वर्तमान में शिक्षा के केन्द्रों के नाम पर धन उगाही केन्द्रों की स्थापना हो रही है. शिक्षकों , छात्रों का शोषण हो रहा है उच्च शिक्षा के नाम पर पैसे लेकर नक़ल कराकर डिग्री बांटना एक परंपरा के रूप में स्थापित होने को है. ऐसे में ईमानदार, ऐसे जो सही मायनो में शिक्षक है, अत्यधिक घुटन भरा वातावरण महसूस कर रहें हैं. हमारे ही बीच ऐसे गिरोहों की स्थापना हो चुकी है जो शिक्षा एवं शिक्षण के पुनीत उद्देश्यों से भटक कर पॉवर एवं पैसा एकत्रित कर आगे बढकर भ्रष्ट राजनीति में संलिप्त होने की कतार में खड़े हैं. शिक्षक संगठन, जो कभी शिक्षकों के मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते थे आज उनके उद्देश्य निजी स्वार्थों पर आधारित होने के कारण अपना अस्तित्व खो रहें हैं. एक कसक सी है आज समाज में इस विसंगति से भरे उच्च शिक्षा के तिलस्म पर कुठाराघात करने की. लोकतान्त्रिक परम्पराओं का लोप हो रहा है. ऐसे में परम आवशयकता है एक ऐसे मंच की जिसके माध्यम से विसंगतियों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार, निजी स्वार्थों के तले कराह रही उच्च शिक्षा को उबारकर उसे सम्मानपूर्वक समाज में स्थापित ऐसे ढंग से करने की कि वह आने वाली नस्लों का मार्गदर्शन कर उन्हें बेहतर जीवन जीने के अवसर प्रदान कर सके. उच्च शिक्षा के आदर्श उद्देश्यों की प्राप्ति में बाधा बने चन्द स्वयंभू ठेकेदारों को बेनकाब करने की भी विशेष जरूरत है. आप सभी से अनुरोध है कि खुलकर इस मंच पर निर्भीकता के साथ अपने अनुभव एवं विचार रखकर शिक्षा जगत में एक रचनात्मक क्रांति के जनक बनने में सहयोग प्रदान करें. आपकी इस ब्लॉग पर अभिव्यक्ति को जहाँ उसे वास्तव में पहुँच कर आशानुरूप परिणाम मिल सके पहुँचाने का पूरा प्रयास करने का वचन देते हुए पुनः शुभकामनाएं एवं धन्यवाद. डॉ. बी. डी. पाण्डेय.
कानपुर विश्वविद्यालय ब्लोग्गर्स असोशिएसन के उदभव पर समस्त बुद्धजीवी वर्ग को शुभकामनाएं. भाई पवन मिश्र जी विशेष रूप से धन्यवाद के पात्र हैं इसलिए कि उन्होंने एक ऐसा मंच तैयार कर दिया है कि आशा करता हूँ हर वो जो विश्वविद्यालयों खासकर कानपुर विश्वविद्यालय के गिरते स्तर के प्रति जागरूक है , चिंतित है , इसके माध्यम से अपनी आवाज़ को उठा सकता है, आगे बढ़ा सकता है. साथिओं, आजकल शिक्षा व्यवस्था एक संक्रमण काल से गुजर रही है. जहाँ एक तरफ सूचना के क्षेत्र में क्रांति है वहीँ सरकारी नीतियों के चलते स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों , विश्वविद्यालयों की बाढ़ से अनेकानेक परिवर्तन हो रहें हैं एवं निकट भविष्य में संभव है. वर्तमान में शिक्षा के केन्द्रों के नाम पर धन उगाही केन्द्रों की स्थापना हो रही है. शिक्षकों , छात्रों का शोषण हो रहा है उच्च शिक्षा के नाम पर पैसे लेकर नक़ल कराकर डिग्री बांटना एक परंपरा के रूप में स्थापित होने को है. ऐसे में ईमानदार, ऐसे जो सही मायनो में शिक्षक है, अत्यधिक घुटन भरा वातावरण महसूस कर रहें हैं. हमारे ही बीच ऐसे गिरोहों की स्थापना हो चुकी है जो शिक्षा एवं शिक्षण के पुनीत उद्देश्यों से भटक कर पॉवर एवं पैसा एकत्रित कर आगे बढकर भ्रष्ट राजनीति में संलिप्त होने की कतार में खड़े हैं. शिक्षक संगठन, जो कभी शिक्षकों के मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते थे आज उनके उद्देश्य निजी स्वार्थों पर आधारित होने के कारण अपना अस्तित्व खो रहें हैं. एक कसक सी है आज समाज में इस विसंगति से भरे उच्च शिक्षा के तिलस्म पर कुठाराघात करने की. लोकतान्त्रिक परम्पराओं का लोप हो रहा है. ऐसे में परम आवशयकता है एक ऐसे मंच की जिसके माध्यम से विसंगतियों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार, निजी स्वार्थों के तले कराह रही उच्च शिक्षा को उबारकर उसे सम्मानपूर्वक समाज में स्थापित ऐसे ढंग से करने की कि वह आने वाली नस्लों का मार्गदर्शन कर उन्हें बेहतर जीवन जीने के अवसर प्रदान कर सके. उच्च शिक्षा के आदर्श उद्देश्यों की प्राप्ति में बाधा बने चन्द स्वयंभू ठेकेदारों को बेनकाब करने की भी विशेष जरूरत है. आप सभी से अनुरोध है कि खुलकर इस मंच पर निर्भीकता के साथ अपने अनुभव एवं विचार रखकर शिक्षा जगत में एक रचनात्मक क्रांति के जनक बनने में सहयोग प्रदान करें. आपकी इस ब्लॉग पर अभिव्यक्ति को जहाँ उसे वास्तव में पहुँच कर आशानुरूप परिणाम मिल सके पहुँचाने का पूरा प्रयास करने का वचन देते हुए पुनः शुभकामनाएं एवं धन्यवाद. डॉ. बी. डी. पाण्डेय.

Saturday, April 2, 2011

विचारों के झरोखे से

आदमी को दूसरे जीवों की नज़र से देखो ,शायद जीना आ जाय।


बिना झूठ बोले दुनिया में रहना मुश्किल है, अगर दुनिया में सच बोलकर रह भी लिए तो पत्नी से बिना झूठ बोले पत्नी के साथ रहना असंभव है।


ऊपर उठने का कोई स्तर न हो पर नीचे गिरने का एक स्तर जरूर बनाना चाहिए।


धन की तीन गति हैं: दान , भोग और नाश


धन की बैलेंस शीट बनाने की बजाय जीवन की बैलेंस शीट बनाकर उसके अनुसार चलने में अधिक सुख है।


मृत्यु निश्चित है , ऐसा जीवन जीना चाहिए की मृत्यु सुखद हो।




Sunday, February 6, 2011

यह कैसी जिंदगी?

कभी कभी सोचता हूँ कि हम प्रगति व विकास के रस्ते पर हैं या विनाश के। कल्पना कीजये जब इस मानव की रचना पृथ्वी पर हुई होगी तो सबसे बड़ी उसकी समस्या क्या थी। मेरी समझ में सबसे बड़ी समस्या अपनी आबादी को बढाना रही होगी। क्योंकि मनुष्य अन्य जीवों के मुकाबले काफी कमजोर प्राणी रहा होगा । उसके पास न तो बड़े बड़े जानवरों जैसा शरीर न ताकत, न भागने की छमता ,और न ही प्रकृति से लड़ने की छमता। हाँ एक चीज़ उसके पास जरूर थी और वो थी उसकी अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक बुद्धि । इसी बुद्धि के कारण उसने अन्य जीवों पर विजय प्राप्त करने के तरीके निकले। नयी नयी खोजें अविष्कार किये जिनसे उसने अपना जीवन सहज बनाने के चक्कर में और भी जटिल एवं समस्याग्रस्त करता गया। जीवन तो सीमित है पर जीने के लिए सामान असीमित बना डाले,और आज उसी के चक्कर में लालच , भ्रष्टाचार , बेईमानी में अपने दिल पर भारी बोझ लिए वह जीने को मजबूर है। कल्पना कीजिये आज से १००-२०० वर्ष पूर्व के भारत के नागरिक की । उस समय व्यक्ति के पास गिने चुने कार्य थे जिसमे मुख्य रूप से भोजन , कपडा एवं रहने के लिए सुरक्षित स्थान की ही समस्या रहा करती रही होगी।मुख्य रूप से जीवन को पूर्ण करने के लिए आज भी वही कार्य हैं। परन्तु आज के युग में तमाम संसाधनों के पा लेने की बहुत सारी कल्पनाएँ हैं। आज हर एक के पास ढेर सारे सपने एवं उन सपनों को पूरा करने के लिए ढेर सारे कार्य हैं । जीवन चक्र पहले भी पूरा कर रहा था और जीवन चक्र आज भी मानव पूरा कर रहा है; परन्तु बड़ी भीड़ , अधिक परेशानी , अधिक चिंताओं के बीच। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बीच आज जीवन कठिन होता जा रहा है। हताशा, निराशा में तरह तरह के मनोवैज्ञानिक रोग बढ रहें हैं। महानगरों में देखिये जिंदगी २४ घंटे किस रफ़्तार से भाग रही है । एक ऐसी भीड़ की तरह जो शायद अपना लक्ष्य भूल गयी हो। जहाँ हर व्यक्ति बिन दिमाग लगाये दुसरे व्यक्ति के पीछे उससे आगे निकलने के लिए दौड़ रहा हो। सुख चैन हराम है ।छोटे संकुचित लक्ष्य और बस भागम भाग।अपनापन समाप्त हो रहा है, आत्मीयता समाप्त हो रही है । मित्रता लाभ के लोभ या हानि के भयवश है; पारिवारिक रिश्ते स्वार्थ पर आधारित हैं।