Tuesday, May 24, 2011
ट्राम से मेट्रो तक
मनुष्य नें बहुत प्रगति की। बुद्धि के बल पर तरह तरह के नियम क़ानून, रहन सहन के तौर तरीके, और ढेर सारी वस्तुएं। लेकिन यह नहीं सोचा कि जीवन के साथ जितनी भी चीजें मूर्त या अमूर्त रूप में जुड़ेंगी उतना ही जीवन जटिल होता जायेगा। और जितना ही जीवन जटिल होता जायेगा उतनी ही दुश्वारियां जीवन चक्र पूरा करने में आएँगी। प्रकृति का एक नियम है--कुछ भी पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है । निसंदेह हमने बहुत कुछ पाया है, पर यह भी न भूलें कि क्या खोया। यह लेखा जोखा रखना आवश्यक है। कहीं ऐसा न हो कि ट्राम से मेट्रो तक के सफ़र में हम हमेशा पाते रहने के फेर में इतना कुछ गवां बैठे कि उसकी पूर्ति असंभव हो जाय और स्थाई रूप से एक रिक्तता हम अपने जीवन में उत्पन्न कर "पॉइंट ऑफ़ नो रिटर्न" पर पहुँच जायं.
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