Thursday, September 2, 2010

एक ही रास्ता

कभी कभी सोचता हूँ की दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति केवल अपनी लाइफ साइकिल पूरी कर रहा है .सभी का लक्ष्य एक है चाहे वो मनमोहन सिंह हों या बराक ओबामा या एक रिक्शेवाला या फेरीवाला। सभी अपने अपने ढंग से मृत्यु की ओर अग्रसर हैं । क्या फर्क पड़ता है? जैसे भी अच्छा लगे जीवन को पूर्ण करो। हाँ सामाजिक नियम कानून के अन्दर अपनी सीमायें बांधकर जीने में आसानी है जबकि उसके बहार निकल कर थोडा कठिनाई का सामना करना पद सकता है। तरह तरह के पदों पर तरह तरह के कार्यों में लगे लोग आखिर किस लक्ष्य की ओर चल रहें है विचारणीय है । किसी भी तरह का घमंड , क्रोध , खुशी, उत्तेजना, इर्ष्या, लोभ, मोह आदि की चरम सीमा एक ही है। व्यक्ति अगर इस विचार को मन में सदैव रखे तो शायद वोह ज्यादा प्रसन्नता के साथ मर सकता है। मुझे इस सन्दर्भ में अल्जीरिया के लेखक अल्बैर कामू का उपन्यास "हैप्पी डेथ" याद आता है जिसमे मुख्य पात्र एक एक दिन के जीवन को मृत्यु की ओर एक एक बढता कदम माना है।